धोरों में गूँजती मांड और लोकगीत: थार की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान

अलगोजा, कमायचा और खड़ताल की धुन पर जब रेगिस्तान में शाम ढलती है, तो सदियों पुरानी दास्तानें जीवंत हो उठती हैं।

507 Head संपादकीय टीमUpdated: 15 अक्टूबर 202615 अक्टूबर 2026 • 4 मिनट पठन
राजस्थानी लोक कलाकार और पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्र

राजस्थान की पहचान उसकी मिट्टी के गीतों और लोक गाथाओं से है। थार के रेगिस्तान में कठिन जीवन के बावजूद लोगों के दिलों में संगीत और उमंग कभी कम नहीं हुई।

यहाँ के लोकगीतों में कभी विरह की पीड़ा है, तो कभी बादलों के आने की खुशी। तेजाजी के भजन, पाबूजी की पड़ और मीरां के पद ग्रामीण जनजीवन की नस-नस में रचे-बसे हैं।

स्थानीय मांगणियार और लंगा कलाकारों ने पीढ़ियों से इस परंपरा को बिना किसी औपचारिक विद्यालय के जीवित रखा है। उनकी उंगलियाँ जब कमायचे के तारों को छूती हैं, तो रेगिस्तान की रेत भी झूमने लगती है।

507 हेड की युवा पीढ़ी आज इन सांस्कृतिक जड़ों से जुड़कर डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी पहचान को दुनिया भर में पहुँचाने का प्रयास कर रही है।

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