राठी गाय: थार मरुस्थल की कामधेनु और पशुपालकों की सच्ची पूंजी

कम चारे और भीषण गर्मी में भी भरपूर दूध देने वाली राठी नस्ल आज पूरे देश के पशुपालकों की पहली पसंद बन रही है।

507 Head संपादकीय टीमUpdated: 18 अक्टूबर 202618 अक्टूबर 2026 • 4 मिनट पठन
मरुस्थलीय परिवेश में राठी गाय और उसका बछड़ा

थार रेगिस्तान में सदियों से पशुपालन ही आजीविका का मुख्य आधार रहा है। यहाँ की स्थानीय जलवायु में पनपी 'राठी गाय' को मरुस्थल की कामधेनु कहा जाता है। यह गाय भीषण 48 डिग्री तापमान और कड़ाके की ठंड दोनों को आसानी से सहन कर लेती है।

राठी गाय की त्वचा पर मौजूद खास पसीने की ग्रंथियां इसे अत्यधिक गर्मी से बचाती हैं। साथ ही स्थानीय सूखी घास, सेवण, धामण और सांगरी के पत्तों को खाकर भी यह प्रतिदिन 12 से 18 लीटर तक पौष्टिक और ए-2 गुणवत्ता वाला दूध देती है।

507 हेड और आसपास के गाँवों में कई पशुपालक आज शुद्ध नस्ल के संवर्धन से अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा रहे हैं। डेयरी उद्योग के साथ-साथ शुद्ध देशी घी की माँग शहरों में तेजी से बढ़ी है।

गोपालकों का कहना है कि अगर पशुओं के टीकाकरण और नियमित स्वच्छ पानी की व्यवस्था रखी जाए, तो राठी पालन किसी भी सरकारी नौकरी से अधिक सम्मानजनक और मुनाफे का काम है।

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