पानी की एक-एक बूँद का मान: पुराने कुंडों और टांकों की अनूठी मरुस्थलीय जल परंपरा

आधुनिक पाइपलाइनों से सदियों पहले थार के लोगों ने छत और आगोर के हर कतरे को सहेजने का जो विज्ञान गढ़ा, वह आज भी प्रेरणा है।

507 Head संपादकीय टीमUpdated: 10 अक्टूबर 202610 अक्टूबर 2026 • 4 मिनट पठन
पारंपरिक राजस्थानी टांका और जल संचयन

बुजुर्ग कहते हैं—'घी ढुल्या म्हारो कुछ नी जावे, पाणी ढुल्या म्हारो जीव जावे।' थार में पानी का सम्मान ईश्वर के समान रहा है।

गाँव के हर घर और खेत में पक्के टांके (पारंपरिक जल कुंड) बनाए जाते थे, जिनका आगोर इतना साफ रखा जाता था कि बारिश का पानी सीधे कुंड में छनकर गिरता था। यह पानी 2 साल तक बिना खराब हुए मीठा और शीतल रहता था।

आज जब भूजल स्तर गिर रहा है, 507 हेड के कई किसान अपने खेतों में फार्म पौंड और रेन वाटर हार्वेस्टिंग टांके बनाकर न केवल पीने का पानी सहेज रहे हैं, बल्कि नहरी बंदी के समय फसलों को भी जीवनदान दे रहे हैं।

शेयर करें:
संबंधित विषय (Tags):
#507 हैड#बुजुर्गों की सीख
507 Head
लेखक / संपादकीय टीम

507 Head संपादकीय टीम

507 हैड और पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीण जीवन, जल, संस्कृति और खेती की सच्ची रिपोर्टिंग।

और भी पढ़ें

इस विषय से संबंधित अन्य लेख

सभी देखें →