नहरी क्षेत्र में खेती: कम पानी में अधिक उपज के पारंपरिक व आधुनिक गुर
नहरबंदी और सीमित जल उपलब्धता के बीच किसान कैसे मिट्टी की नमी सहेजकर बंपर पैदावार ले रहे हैं, जानिए इस रिपोर्ट में।
पश्चिमी राजस्थान के नहरी क्षेत्रों में खेती केवल मिट्टी और बीज का खेल नहीं, बल्कि समय प्रबंधन और जल संरक्षण का विज्ञान है। 507 हेड क्षेत्र में जब नहरी पानी की बारी आती है, तो किसान दिन-रात एक कर देते हैं।
हाल के वर्षों में ड्रिप इरीगेशन (फव्वारा व बूँद-बूँद सिंचाई) और लेजर लैंड लेवलिंग तकनीकों ने किसानों की दिशा बदली है। पारंपरिक धोरा सिंचाई की जगह अब पक्के खाळे और पाइपलाइनों का उपयोग बढ़ रहा है, जिससे पानी का रिसाव 40 प्रतिशत तक कम हुआ है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नहरी रेतीली मिट्टी में जैविक खाद और हरी खाद (ढैंचा) का प्रयोग मिट्टी की जल धारण क्षमता को दोगुना कर देता है।
किसानों का कहना है कि सही समय पर बुवाई और जैविक तौर-तरीकों को अपनाकर न केवल लागत कम होती है, बल्कि फसल का स्वाद और बाजार भाव भी बेहतर मिलता है।

507 Head संपादकीय टीम
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